Uttarakhand

IIT रुड़की का बड़ा खुलासा! केदारनाथ जलविद्युत और तमिलनाडु सौर-पवन ऊर्जा के लिए परफेक्ट जगह

IIT रुड़की का अध्ययन: शिव मंदिर और पर्यावरणीय संसाधनों के बीच गहरा संबंध

  • भारत के आठ प्रमुख शिव मंदिरों का स्थान न केवल आध्यात्मिक महत्व रखता है, बल्कि यह ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधन समृद्ध क्षेत्रों के पास भी स्थित हैं। उदाहरण के लिए, उत्तराखंड का केदारनाथ जलविद्युत उत्पादन के लिए आदर्श है, जबकि तमिलनाडु के कुछ स्थल सौर और पवन ऊर्जा उत्पादन के लिए उपयुक्त हैं।
  • यह निष्कर्ष IIT रुड़की के शोधकर्ताओं ने अमृता विश्वविद्यालय (भारत) और उप्साला विश्वविद्यालय (स्वीडन) के सहयोग से किया। उनका अध्ययन Humanities and Social Sciences Communications (Nature Portfolio) में प्रकाशित हुआ है।
  • शोध में उत्तराखंड के केदारनाथ, तमिलनाडु के रामानाथ स्वामी, तिरुवन्नामलाई, एकम्बरनाथर, चिदंबरम नटराज, जम्बुकेश्वर और आंध्र प्रदेश के मल्लिकार्जुन स्वामी एवं श्रीकालहस्ती मंदिरों का विश्लेषण किया गया।

शिव शक्ति अक्ष रेखा (SSR) का खुलासा

प्रोफेसर केएस काशीविश्वनाथन, प्रमुख शोधकर्ता और WRDM विभाग के सदस्य, के अनुसार ये मंदिर 79° पूर्वी देशांतर के आसपास एक संकरी उत्तर-दक्षिण पट्टी पर स्थित हैं, जिसे शोध में शिव शक्ति अक्ष रेखा (SSR) कहा गया है। उपग्रह डेटा, भू-स्थानिक मॉडलिंग और पर्यावरणीय उत्पादकता विश्लेषण से पता चला कि यह संरेखण जल उपलब्धता, नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता और कृषि उपज वाले क्षेत्रों से मेल खाता है।

पर्यावरणीय और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि

शोध से यह स्पष्ट होता है कि मंदिरों का चयन केवल आध्यात्मिक नहीं था, बल्कि यह पर्यावरणीय जागरूकता और संसाधन प्रबंधन पर आधारित था। SSR क्षेत्र का सिर्फ 18.5% हिस्सा अध्ययन में शामिल था, लेकिन इसमें सालाना 44 मिलियन टन चावल उत्पादन और लगभग 597 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता पाई गई, जो भारत की वर्तमान स्थापित क्षमता से भी अधिक है।

अध्ययन में यह भी बताया गया कि कई मंदिर पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) का प्रतीक हैं। शोध दल का मानना है कि प्राचीन भारतीय सभ्यताओं को भूमि, जल और ऊर्जा संसाधनों की गहरी समझ थी, जिसने उन्हें मंदिर निर्माण के स्थान चुनने में मार्गदर्शन दिया।

आधुनिक विकास के लिए सीख

प्रो. भाबेश दास ने कहा कि यह अध्ययन दिखाता है कि प्राचीन मंदिर निर्माता पर्यावरणीय योजनाकार भी थे। उनके निर्णय केवल आस्था पर आधारित नहीं थे, बल्कि अनुभवजन्य और व्यावहारिक ज्ञान पर भी आधारित थे। प्रो. थंगा राज चेलिया के अनुसार यह अध्ययन विरासत और प्राकृतिक संसाधनों के बीच पुल बनाने का काम करता है।

यह शोध यह भी रेखांकित करता है कि भारत की सांस्कृतिक विरासत में पर्यावरणीय रणनीति भी शामिल है, जिसे आधुनिक सतत विकास और योजना में समझकर लागू किया जा सकता है।

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