द्वितीय केदार मद्महेश्वर मंदिर बंद हुआ शीतकाल के लिए, 21 को ऊखीमठ पहुंचेगी भगवान की चल विग्रह डोली
- द्वितीय केदार श्री मद्महेश्वर मंदिर के कपाट मंगलवार प्रातः आठ बजे शीतकाल के लिए परंपरागत विधि-विधान के साथ बंद किए गए। यह पावन समारोह मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्दशी और स्वाति नक्षत्र के शुभ संयोग में सम्पन्न हुआ। कपाट बंद होने के इस वार्षिक आयोजन में बीकेटीसी के अधिकारी-कर्मचारी, वन विभाग के प्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी तथा साढ़े तीन सौ से अधिक श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर भगवान मद्महेश्वर के दर्शनों का लाभ लिया।
- शीतकालीन व्यवस्था की तैयारियाँ एक दिन पहले ही शुरू हो गई थीं। सोमवार से पूरे मदमहेश्वर मंदिर परिसर को स्थानीय फूलों से अत्यंत सुंदर और भव्य रूप में सजाया गया था। ब्रह्म मुहूर्त में मंदिर के पट खुलते ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें दर्शन-पूजन के लिए उमड़ पड़ीं। सुबह सात बजे से कपाट बंद करने की विधि आरंभ हुई, जिसके दौरान मंदिर में गूंजते मंत्रोच्चारण ने वातावरण को और अधिक आध्यात्मिक बना दिया।
- इस पवित्र प्रक्रिया के दौरान मंदिर के पुजारी ने बीकेटीसी मुख्य कार्याधिकारी एवं कार्यपालक मजिस्ट्रेट विजय प्रसाद थपलियाल, बीकेटीसी सदस्य प्रहलाद पुष्पवान, और पंच गौंडारी हक-हकूकधारियों की उपस्थिति में स्वयंभू शिवलिंग को पारंपरिक रूप से समाधि स्वरूप प्रदान किया। शिवलिंग को स्थानीय पुष्पों व पवित्र राख से ढकने के बाद सुबह आठ बजे जयघोषों—“हर हर महादेव” और “जय मद्महेश्वर”—की गूँज के बीच कपाट शीतकाल के लिए विधिवत बंद कर दिए गए।
- कपाट बंद होने के पश्चात भगवान मद्महेश्वर की चल विग्रह डोली को भंडार निरीक्षण और मंदिर परिक्रमा कराई गई। इसके बाद डोली ने ढोल-दमाऊं की मंगल ध्वनियों, जयघोषों और भक्तों की आस्था से भरे उल्लास के साथ अपने प्रथम पड़ाव गौंडार की ओर प्रस्थान किया। इस दौरान मार्ग में उपस्थित श्रद्धालुओं ने फूल वर्षा कर भगवान की डोली का स्वागत किया।
- हर वर्ष की भांति इस बार भी डोली यथानियमित यात्रा के साथ ऊखीमठ स्थित ओंकारेश्वर मंदिर में शीतकालीन पूजा-अर्चना हेतु विराजमान होगी, जहाँ आने वाले महीनों में भक्त भगवान मद्महेश्वर के दर्शन करेंगे।
