Uttarakhand

दानपुर की आस्था खाक: बदियाकोट के आदिबद्री मंदिर में लगी भीषण आग, सदियों पुराना इतिहास और श्रद्धा का केंद्र जलकर राख

  • दानपुर क्षेत्र की सदियों पुरानी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत पर एक बड़ा संकट आ गया है। जिला मुख्यालय से करीब 58 किलोमीटर दूर बदियाकोट स्थित प्रसिद्ध आदिबद्री मां नंदा भगवती मंदिर में अचानक लगी भीषण आग से पूरा मंदिर जलकर राख हो गया है। पहाड़ के किसी मंदिर में आग लगने की यह अपनी तरह की पहली और बेहद दुखद घटना बताई जा रही है, जिससे पूरे क्षेत्र के भक्तों में शोक और स्तब्धता का माहौल है।

दानपुर की 14 पट्टी का साझा शक्तिपीठ है यह मंदिर

  • दानपुर की 14 पट्टी का यह साझा शक्तिपीठ लोक परंपराओं, सामूहिक आस्था और समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का मुख्य केंद्र रहा है। यह मंदिर सिर्फ एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं, लोककथाओं और हर आठ वर्ष में होने वाली प्रसिद्ध ‘आठ्यौं जात’ से गहराई से जुड़ा हुआ है।

क्या है मंदिर से जुड़ी लोकमान्यता?

  • क्षेत्र में प्रचलित मान्यता के अनुसार, चमोली के बंड क्षेत्र के छलि और बलि नाम के दो भाई गढ़वाल में एक मृग का पीछा करते हुए बदियाकोट पहुंचे थे। यहाँ छोटी पहाड़ी के पास मां नंदा भगवती ने उन्हें कन्या के रूप में दर्शन दिए और उसी स्थान पर मंदिर स्थापित कर सेवा करने का आदेश देकर अंतर्ध्यान हो गईं। आगे चलकर दोनों भाइयों के छह-छह पुत्र हुए, जिनकी संतति ‘बारह बदकोटी’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। स्थानीय परंपराओं में इस वंश का संबंध मां नंदा के विभिन्न शक्तिपीठों की पुजारी व्यवस्था से भी रहा है।

मल्ला और तल्ला दानपुर की आस्था का केंद्र

  • बदियाकोट मंदिर मल्ला और तल्ला दानपुर की धार्मिक परंपराओं में सर्वोच्च स्थान रखता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार मां नंदा भगवती के तीन प्रमुख सिद्धपीठ हैं— बदियाकोट का आदिबद्री पीठ, सरयू घाटी का बैछमधार सिद्धपीठ और पोथिंग स्थित मां नंदा सिद्धपीठ।
  • इस मंदिर से खाती, वाछम, सोराग, तीख, डौला, किलपारा, कुवारी, कालौ, बोराचक और झारकोट सहित कई गांवों के लोग जुड़े हैं। यहाँ जोहार-मुनस्यारी, पिंडर घाटी और गढ़वाल तक के श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए पहुँचते हैं। मंदिर के निर्माण और रखरखाव में हमेशा से श्रमदान और आपसी सहयोग की अनूठी परंपरा रही है।

प्रसिद्ध ‘आठ्यौं जात’ और ऐतिहासिक मान्यताएं

  • मंदिर की परंपराओं में ‘आठ्यौं जात’ का विशेष महत्व है। मान्यता के अनुसार, हर आठ वर्ष में बड़ी ‘आठ्यौं जात’ और चार वर्ष में ‘घर-आठ्यौं’ का आयोजन होता है। नंदा अष्टमी के अनुष्ठानों में दूर-दराज से लोग शामिल होते हैं। इस दौरान दानपुर के ‘दाणू देवता’ विभिन्न क्षेत्रों में जाकर लोगों को आमंत्रित करते हैं।
  • सोराग गांव को मां भगवती का मायका माना जाता है और परंपरा के अनुसार यहाँ के ग्रामीणों को छत के लिए धूरा का लट्ठा ले जाने का पारंपरिक अधिकार है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, ब्रिटिश काल में इस मंदिर को ‘गूंठ’ (दान में दी गई भूमि) दिए जाने और पिंडारी क्षेत्र में पशु चुगान से मिले कर का हिस्सा भेंट किए जाने का भी उल्लेख मिलता है।
  • इतिहास, लोक-संस्कृति और आस्था के इतने बड़े केंद्र के इस तरह अचानक आग की भेंट चढ़ जाने से स्थानीय लोगों में गहरी मायूसी है। क्षेत्र के लोगों ने शासन-प्रशासन से इस ऐतिहासिक धरोहर के पुनर्निर्माण और पूरे मामले की गंभीरता से जांच की मांग की है।

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