उत्तराखंड में गैस से बिजली उत्पादन हुआ 8 गुना महंगा, संकट में पावर प्लांट; बंद होने की नौबत
- उत्तराखंड की बिजली व्यवस्था पर करीब एक दशक पहले लिया गया एक फैसला अब भी असर डाल रहा है। वर्ष 2016-17 में बिजली खरीद को लेकर किए गए दीर्घकालीन करार के चलते गैस आधारित बिजली की लागत मौजूदा समय में इतनी बढ़ गई है कि सस्ती बिजली उपलब्ध होने के बावजूद यूपीसीएल को इन संयंत्रों से सीमित मात्रा में ही बिजली खरीदनी पड़ रही है।
- गैस से बनने वाली बिजली की कीमत और दूसरे स्थायी स्रोतों से मिलने वाली बिजली की लागत में बड़ा अंतर सामने आया है। वर्ष 2026-27 में गैस आधारित बिजली की स्वीकृत औसत लागत 31.71 रुपये प्रति यूनिट बताई गई है, जबकि अन्य स्थायी स्रोतों से बिजली की औसत लागत करीब 4.23 रुपये प्रति यूनिट है। इस हिसाब से गैस आधारित बिजली करीब आठ गुना महंगी पड़ रही है।
- इस महंगी बिजली का असर केवल बिजली खरीद तक सीमित नहीं रहता। बिजली कंपनियों की कुल लागत में महंगी खरीद शामिल होने के कारण इसका प्रभाव आगे चलकर बिजली व्यवस्था और उपभोक्ताओं पर पड़ने वाली लागत पर भी दिखाई दे सकता है।
- 321 मेगावाट की स्थापित क्षमता वाले इन गैस आधारित बिजली संयंत्रों के साथ दीर्घकालीन खरीद व्यवस्था होने के बावजूद अब इनसे बिजली लेने की मात्रा लगातार घट रही है। वर्ष 2026-27 में इन संयंत्रों से केवल 472.80 मिलियन यूनिट बिजली की उपलब्धता स्वीकृत की गई है।
- आंकड़ों पर नजर डालें तो यह गिरावट और स्पष्ट हो जाती है। वर्ष 2024-25 में स्वीकृत बिजली उपलब्धता 1370.83 मिलियन यूनिट थी, जो 2025-26 में घटकर 1223.45 मिलियन यूनिट रह गई। अब 2026-27 के लिए यह आंकड़ा सीधे 472.80 मिलियन यूनिट पर पहुंच गया है।
- यानी दो साल के भीतर 2024-25 की तुलना में स्वीकृत उपलब्धता में करीब 65.5 प्रतिशत की कमी आई है। एक तरफ 321 मेगावाट क्षमता का दीर्घकालीन करार बना हुआ है, वहीं दूसरी तरफ इन संयंत्रों से बिजली खरीद की मात्रा लगातार कम होती जा रही है। इससे गैस आधारित बिजली संयंत्रों की उपयोगिता और पुराने बिजली खरीद समझौतों की लागत को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं।
